Sunday, 2 October 2016

mom son

शब्द हैं थोड़े उनके आगे ……
कैसे उन्हें पिरोऊँ मैं ?
“माँ ” की ममता सोच कर देखूँ  तो …..
बिन आँसूं के रोऊँ मैं ।
जिसने ये संसार बनाया ,
उनके स्नेह से मन हरषाया,
उनकी गोद में सर रखकर ….
बिन नींदों के सोऊँ मैं ।
शब्द हैं थोड़े उनके आगे ……
कैसे उन्हें पिरोऊँ मैं ?
“माँ” का प्यार है ऐसा निराला ,
दुश्मन का सर भी है झुक डाला ,
ऐसी “माँ ” का लाल बनकर ,
बिन हीरे के दमकूं मैं ।
शब्द हैं थोड़े उनके आगे ……
कैसे उन्हें पिरोऊँ मैं ?
जीवन पथ की कठिन डगरिया,
पार हुई पकड़ “माँ” की उंगलिया ,
डूब जाऊँ तो भी नहीं है गम अब ….
बिन पतवार की नईया खेमे में ।
शब्द हैं थोड़े उनके आगे ……
कैसे उन्हें पिरोऊँ मैं ?
“माँ” की भक्ति में हैं चारों धाम ,
तन-मन में बसा हो जब उनका नाम ,
प्राणओं को निकलते हुए न हो दर्द ,
बिन मौत के साँसों को रोकूँ मैं ।
शब्द हैं थोड़े उनके आगे ……
कैसे उन्हें पिरोऊँ मैं ?

No comments:

Post a Comment